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Sunday, 7 April 2013

चालू खाते का ज्यादा घाटा चिंताजनक Rbi

देश में चालू खाते के घाटे के ऊंचे स्तर को चिंताजनक बताने के बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने भुगतान संकट की स्थिति पैदा होने की आशंका को खारिज किया है। बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने कहा कि वर्ष 1991 जैसे भुगतान संकट से सामना होने की कोई आशंका नहीं है।
कर्नाटक चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा आयोजित सम्मेलन में सुब्बाराव ने कहा कि वर्ष 1991 जैसे हालात बनने की आशंका नहीं है क्योंकि हम काफी आगे बढ़ चुके हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था काफी उदारीकृत है और हम दुनिया के अन्य बाजारों से जुड़ चुके हैं। हमारी विनिमय दर बाजार संचालित हैं और हमारा वित्तीय तंत्र काफी व्यापक है। इसलिए हमें अब वर्ष 1991 जैसे भुगतान संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा। हालांकि चालू खाते के घाटे का ऊंचा स्तर चिंताजनक है।

दिसंबर 2012 तिमाही में चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 6.7 फीसद के स्तर पर पहुंच गया। हालांकि वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि पूरे वित्त वर्ष के लिए चालू खाते का घाटा 5.2 फीसद से कम रह सकता है। घाटे में कमी के लिए निर्यात बढ़ाने और गैर जरूरी आयात में कमी लाने की जरूरत है।
सुब्बाराव ने कहा कि वर्ष 1991 के भुगतान संकट के कारण देश में आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई थी। इसके बाद 15-17 साल तक राजकोषीय और महंगाई की मुश्किलों के बावजूद विदेशी व्यापार क्षेत्र में खासी वृद्धि हुई। पिछले तीन साल में इस क्षेत्र पर कुछ दबाव की स्थिति बनी है। आरबीआइ गवर्नर ने बीते वित्त वर्ष में पांच फीसद की विकास दर को काफी असहज स्थिति बताया है।
भारतीय रिजर्व बैंक तीन मई को वित्त वर्ष 2013-14 के लिए आर्थिक विकास दर का अनुमान जारी करेगा। सुब्बाराव ने कहा कि निवेश में कमी आना बड़ी चिंता है क्योंकि आज का निवेश कल की उत्पादन क्षमता होती है। विकास दर घट रही है क्योंकि निवेश में लगातार कमी आ रही है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि देश के मौजूदा आर्थिक हालात के लिए केवल अंतरराष्ट्रीय कारण जिम्मेदार नहीं है बल्कि अर्थव्यवस्था घरेलू कारणों से भी प्रभावित हो रही है।
खाने की आदतों में बदलाव से बढ़ी महंगाई
सुब्बाराव ने ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की खान-पान की आदतों में बदलाव को महंगाई के लिए जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों में ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आय में खासी वृद्धि हुई है इससे उनकी खान-पान की आदतों में बदलाव हुआ है और खपत बढ़ी है।
सुब्बाराव ने कहा कि गरीब वर्ग के लोगों की आय बढ़ी है, इससे उनकी खान-पान की आदतों में तब्दीली आई है। लोग अब मोटे अनाजों के बजाय प्रोटीन युक्त दालों और अंडा, मांस, दूध, सब्जी और फलों का उपभोग बढ़ा रहे हैं। इससे खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी हो रही है। हमारे पास इस बात के सबूत हैं कि पिछले पांच साल में ग्रामीण क्षेत्रों में आय सालाना 20 फीसद की दर से बढ़ी है। यह एक बड़ी सफलता है।

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